Tuesday, July 22, 2008

चनेवाली चाची . भाग-54

मेरी सांसें बहुत जोर-जोर से चल रही थीं... अभी मैं दरवाजे तक पहुँची भी नहीं थी की राजू ने मेरे सामने आकर मेरा रास्ता रोक लिया ... वह बहुत विचलित दिख रहा था... उसके चेहरे की हवाइयां उड़ रही थीं..

मालती- शायद डर गया होगा... सोचता होगा की गाँव के लोगों को अगर इसकी भनक लग गयी तो बदनामी हो जायेगी...पिटाई अलग ... गाँव के लोग तो वैसे भी खतरनाक होते हैं...
- हाँ , वह हाथ जोड़कर मेरे सामने गिदगिदाने लगा... मेरा दिल पिघल गया... मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे... मैंने राजू के जुड़े हुए हाथों को अलग करने की कोशिश की तो उसने मेरे हाथों को चूम लिया... मेरी आंखों में झाँककर राजू कह रहा था -
-एक पल में ही तुमने मेरे होंसलों को इतना बढ़ा दिया की मैं आसमान पर उड़ने लगा... फ़िर अगले ही पल मुझे तुमने पाताल में धकेल दिया... इस तरह नाराज़ होने का मतलब समझती हो तुम? मेरी जान भी जा सकती है... सच कहता हूँ... आज मुझे अजमाकर देखलो, तुम्हारी समझ में सब बातें आ जायेगी... मेरे जैसा अहमक किसी ने कभी नहीं देखा होगा... मैं सर पटक-पटककर अपने प्राण त्याग दूंगा...
- फ़िर तुमने ऐसी हरकत क्यों की ?मेरा कमरबंद क्यों तोडा?
राजू- मैं बहुत जोश में आ गया था... तुम्हारे प्यार ने मुझे पागल बना दिया है...
- लेकिन , हम दोनों को कोई देख लेता तो क्या होता, मैं किसी को मुह दिखने के लायक होती क्या ? तुम तो अपने गाँव चले जाते , वहां से सीधे कोलकाता जाकर मौज उडाते...
राजू- अब यहाँ से मेरा अकेला जाना सम्भव नहीं है... जाऊंगा तो अपनी आशा को साथ लेकर जाऊंगा... चाहे इसका जो परिणाम हो, अब मैं पीछे हटने वाला नहीं हूँ ... या तो प्यार में मेरी जान आएगी या फ़िर मेरी जानेमन मेरे साथ जायेगी... तुम चलोगी न मेरे संग ?
- ना जान , ना पहचान, मैं तेरा मेहमान वाली बातें न करो... तुम तो ठहरे परदेसी , तुम पर कोई भरोसा कैसे करे?
राजू- तुम्हारे क़दमों में अपनी जान तो रखदी है, अब किसी संदेह की गुंजाईश ही कहाँ है ?
-इस तरह के डायलोग फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं...
राजू- यह किसी की जिन्दगी का मसला है, ज़रा सोच-समझकर जवाब दो...
- मेरी मम्मी से बात करने की ताकत है?
राजू- क्योँ नहीं ? मैं आज ही बात कर लूँगा ...
- आज तो तुम लोग जाने वाले हो , फ़िर क्या ख्यालों में बात कर लोगे ?
राजू - तुम इशारा भी करोगी तो जीवन भर तुम्हारे दरवाजे पर ही पडा रहूँगा...
जब उसने देखा की मैं थोड़ी सी ठंडी पड़ रही हूँ, तो वह फ़िर से शरारती हो गया... उसने मुझे फ़िर से अपनी गोद में भर लिया और एक कोने की तरफ़ ले गया... इस बार मैं ज्यादा दरी हुई नहीं थी ... वह मेरे होठों को प्यार से चूम रहा था... इस बार वह इतना ज्यादा कामुक था की मैं उसकी बेकरारी को सिर्फ़ देखती जा रही थी ... इस वक़्त मैं अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव महसू कर रही थी... पहले मुझे राजू कुछ अजनबी सा लग रहा था , अब स्थिति भिन्न थी... अब मैंने ख़ुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया था... वह मेरेसीने को सहलाते हुए काफी उत्तेज़क हो रहा था... उसका संवेदनशील अंग बगावत पर उतारू हो गया... धीरे -धीरे वह मेरे अन्य अंगों को सहलाने लगा...



Monday, July 21, 2008

भाग- ५३

राजू- तुम्हारे गदराये हुए बदन से जो खुशबु आ रही है, उससे मेरा मन महक उठा है...
-मेरी स्थिति भी बड़ी अजीब है ... समझ नहीं पाता , अब क्या होगा ,कुछ पता नहीं... तुम्हारे बिना जीवन सूना-सूना हो जाएगा... इस तरह का एहसास भी मुझे पहली बार ही हुआ है ... अब तो लहता है, जैसे नींद भी नहीं आ पायेगी... तुम्हारी तुम जानो, मैं अपने दिल की बात बता रहा हूँ...
-मेरे दिल पर हाथ तो रखके देखो... कितने जोर- जोर से धड़क रहा है...
राजू ने सचमुच मेरे सीने पर हाथ रख दिया... जब मैंने उसका हाथ हटाया तो वह उग्र हो गया... उसने मेरे उभारों को बुरी तरह से मसल दिया... मुझे बहुत जोर का दर्द हुआ... एक बार तो दिल में आया की राजू को लात मरकर अपने ऊपर से हटा दूँ, मगर मैं ऐसा नहींकर सकी...राजू अब इन उभारों को आहिस्ता-आहिस्ता सहला रहा था... मुझे जल्दी ही सुख मिलने लगा... राजू का हौसला बढ़ने लगा था... वह मेरे कुर्ती के अन्दर हाथ डालने लगा, जब मैंने विरोध किया तो मंत्र हाथ झटक दिया... मैं चुप हो गयी... उसका स्पर्श बड़ा सुखदाई था... ऐसा लगता था, जैसे की मैं स्वर्ग में उड़ने लगी... राजू बेहद चालाक था... वह अपने हाथों का दबाव बस इतना ही बढाता था, जितना मैं सहन कर सकूं... उसके चुम्बन लेने का तरीका भी एकदम अलग था... जब वह ठंडी-ठंडी आह भरता तो मेरे अन्दर टूट-फ़ुट होने लगती थी...मैं कमजोर होकर रह जाती थी ... राजू उन क्षणों का फायदा उठाना अच्छी तरह से जनता था... जब उसने मेरे जिस्म में कामोत्तेजना की आग लगाकर मुझे पूरे तरह बेकरार कर दिया तो मैं अपने होशो-हवाश खो बैठी... राजू ने मेरे कमरबंद को एक ही झटके में तोड़ डाला ... इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से मैं सन्न रह गयी...
मालती- तुम किसी घर में थे क्या?
- नहीं , वह हमारे रहने का घर नहीं, पशुओं को बंधने का ठिकाना था... वह हमारे खेत पर था... चारों तरफ़ बहुत ऊंची-ऊंची बाउंड्री लगी हुयी थी...
-वहबड़े सुख के क्षण होंगे...बड़ा आनंद आ रहा होगा?
- तुम्हें सुख की पडी है, मेरी तो उस समय जान ही निकल गयी थी ... कमरबंद टूटते ही मैं घबरा गयी थी... खेल-खेल में जो प्यार का खेल हमने शुरू किया था, वह अब गंभीर रूप धारण कर चुका था... मैंने कहा-
-होश में आओ राजू... यह क्या हरकत कर रहे हो...?
राजू- ऐसा मत कहो मेरी जान, यही तो सच्चा प्यार है... अब हमारा प्यार शुरू हो रहा है... अगर तुम बीच में ही रोकोगी तो मज़ा नहीं आएगा...
- यह क्या बदतमीजी है? तुम मेरी इज्ज़त लूटना चाहते हो ? मुझसे दूर हट जाओ ... मेरी आंखों में इस समय खून तैर रहा है... खेल-खेल में ही तुम मेरी आबरू तक पहुँच गए...
राजू- यह क्या कह रही हो ?तुम मेरी शुद्ध भावनाओं को ठेस मत पहुँचाओ ... जब दो प्यार करने वाले आपस में मिलकर सम्बन्ध बनाते हैं तो क्या वह इज्ज़त लूटना कहलाता है... ?
- वह बात अलग है... शादी करने के बाद कोई कुछ भी कर सकता है... शादी से पहले यह सब नहीं हो सकता ... यह गैर कानूनी है... अगर अब तुमने मुझे हाथ भी लगाया मुझसे बुरा कोई नहीं होगा...
राजू- तुम बेवजह परेशान हो रही हो... शादी का मतलब तो समझो...
मालती-ओह, फ़िर क्या हुआ ?
- फ़िर मैं वहां से चली गयी ... मैंने जल्दबाजी में अपना कमर बंद किया और सर पर पैर रखकर भाग गयी...



Sunday, July 20, 2008

भाग -५२

मालती-बड़ा ढीठ निकला वों तो...
- हाँ, जब मुझे लगा की वह किसी भी हालत में नहीं मानेगा तो मैंने पूरी ताक़त के साथ उसे धक्का मार दिया...
मालती- फ़िर तो वह भाग गया होगा?
- क्या बात करती हो, वह मेरे और करीब आ गया था... पहले तो मुझे भी वाही लगा जैसा की तुम सोच रही हो... लेकिन मेरा अनुमान ग़लत था... वह तो बाहर का दरवाज़ा बंद करने गया था ... जब मैंने उसे सामने आते देखा तो थोडी सी रहत की साँस ली... अब मुझे किसीके देखने का डर नहीं था... मेरा कुंवारा तन उसके स्पर्श के लिए बेहाल था... राजू मुस्कान मेरे दिल की गहराइयों में उतरती चली जा रही थी... मेरे करीब आकर उसने मेरे होठों से अपने गर्म होठ सता दिए... उसकी सांसें मेरी सांसों से टकराकर वासना का ज्वालामुखी पैदा कर रही थीं ... मैं तो उस समय अपनी सुध-बुध खोये हुए थी... मेरे ऊपर नशा जैसा छा गया... मैं खामोश हो गयी... वह मेरे होठों का रसपान कर रहा था...
मालती- आह , मुझे तो अब भी आनंद आ रहा है...
- हाँ , उस सुख की बात ही अलग थी... उससे पहले मेरे बदन को किसी ने भी नहीं छुआ था... कोरा बदन ज़रा से स्पर्श से ही सिहर उठता था... राजू मेरी गोलाइयों को दबा रहा था... मेरी आहें तेज़ होने लगीं ... उसने मुझे झट से नीचे गिरा दिया... शुरात में तो मुझे काफी डर लगा, लेकिन जब उसने कायदे से प्यार करना आरभ किया तो मुझे असीम सुख की प्राप्ति होने लगी... मैंने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद करलीं ... इसके बाद राजू ने जोरदार हरकतें करनी शुरू कीं तो मेरी सांसें और भी जोर-जोर से चलने लगीं... मेरा यह पहला अनुभव था... राजू मेरी जाँघों को सहलाते हुए कह रहा था-
-तुम बेहद सुंदर हो ,कोलकाता में भी एक से एक सुंदर लड़कियां हैं मगर तुम सबसे अलग हो... तुम्हारे होठ कमल की पंखुडियों की तरह कोमल है... चेहरा तो चाँद से भी सुंदर है... फिल्मी दुनिया की बात तो छोडिये , सारे ज़हान में इतनी खुबसूरत हसीना नहीं देखी...
- इतना झूठ क्यों बोलते हो ... मुझसे भी ज्यादा मोटी-तगडी सैकडों लड़कियां हमारे ही गाँव में मौजूद है...
राजू - यही तो है... तुम ये भी नहीं समझतीं की सुन्दरता की परिभाषा क्या होती है...?
-मुझे बहकाओ मत ... शहर के सब लड़के इसी तरह की बात कहते हैं ... चाहे कोई कितनी भी कालू-कलूटी क्यों न हो, उसको भी ज़न्नत की हूर बताते हैं... मैंने बहुत सुन रखा है...
राजू- अच्छा, तुमसे भी किसी ने ऐसा बोला था क्या?
- किसी की हिम्मत है क्या, तुमने अभी मेरा गुस्सा नहीं देखा, किसी से पूछकर देखो,मेरे डर के मारे मोहल्ले में कोई कुछ नहीं कह सकता...
राजू- और अगर भूलवश किसी ने कुछ कह दिया तो ?
-तो उसकी जान को आ जाउंगी... मुझसे फ़िर वह जिंदा रहकर दिखाए तो जानूं ...
राजू- लेकिन मुझमें ऐसा क्या है जो तुम कुछ नहीं कह रही ?
-पता नहीं... क्या पता तुमको कोई जादू-वादू आता होगा ? सुना है बंगाल में ये सब बहुत चलता है... तुमने भी मेरे ऊपर कोई मंत्र चला दिया होगा... हम ठहरे गाँव के गंवार ... हम क्या जानें की कहाँ क्या होता है...?
राजू- तुम्हारी बातों का भी ज़बाव नहीं है... जब भी बोलती हो, दिल में समाती चली जाती हो...
- इन बैटन को सुन-सुनकर मुझे लाज आती है...
राजू- अभी से इतनी शरमाओगी तो हमसे शादी कैसे करोगी?
- छी... अम्मा सुनेंगी तो बहुत मारेंगी...न तुम्हारी खैर, न मेरी खैर...
राजू- अरे खुश हो जाएँगी वों..उनको घर बैठे-बिठाये दूल्हा मिल रहा है, वरना तो ढूँढने में ही लोगों के हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं ...
-मुझे उतना अच्छा बोलना नहीं आता... तुम बात में से बात निकाल लेते हो...


Saturday, July 19, 2008

सच टो ये है की राजू मेरे तन-मन में बस गया था... वह उठकर जा चुका था ... मगर जाते -जाते मेरे चैन -करार को भी लूटकर ले गया... पता नहीं उसमें ऐसा क्या था की मैं चुम्बक की तरह चिपकती चली जा रही थी... उसके सिवाय मुझे कुछ याद नहीं था... मेरी बाली उमर थी...तभी से यह इश्क का रोग लग गया... मालती- फ़िर राजू से मुलाक़ात कैसे हुई? आशा- हमारे घर पर भैंस पालने का कार्य होता था... मैं भैंस बंधने के लिए खेत पर गयी हुई थी... तभी मुझे किसीने पीछे से डरा दिया... किसी की बाहें मेरी कमर के इर्द-गिर्द घूम रही थीं... मैंने मुड़कर देखा तो शर्मा गयी... झूठे ही सही ,मगर मैंने उसका विरोध करते हुए कहा- -ये क्या करते हो? कोई देख लेगा तो क्या होगा ? राजू- अगर तुम्हारी राजी रही तो दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती... - और अगर मेरी इच्छा नहीं हुई तो? राजू- ऐसा कैसे हो सकता है , तुमारा चेहरा ही चुगली कर रहा है... आँखें तो सारा राज़ पहले ही उगल चुकी हैं... तुम्हारा छिप-छिपकर देखना मुझे अच्छी तरह याद है... तुम्हारी चोरी मैं पकड़ चुका हूँ... -और तुम बड़े शरीफ आदमी हो... जैसे की मैं तुम्हें जानती नहीं... राजू- ये तो बहुत अच्छी बात है की तुम भी मेरे बारे में जान गयी हो, मैं भी तो जानूं मेरे बारे में क्या ज्ञान प्राप्त किया है... इस गाँव में आए हुए मुझे अभी दो दिन ही तो हुए हैं... -तभी से तुम मुझे ही खोजते रहते हो... जहाँ मैं जाती हूँ, तुम भी पीछे- पीछे आ जाते हो... गाँव की सभी लड़कियों को लाइन मरते फिरते हो... सोचते होंगे की कहीं तो जुगाड़ बैठ ही जाएगा... मगर इओस गाँव की लड़कियां इतनी बेवकूफ नहीं हैं... शहर के लड़कों की चालाकी को अच्छी तरह से जानती हैं... समझे तुम? अब अगर खैरियत चाहते हो तो मेरी बांह छोड़ दो ... मैं जल्दी में हूँ... राजू- अगर हाथ नहीं छोडा तो क्या कर लोगी ? ज्यादा करोगो तो आज ही माँ जी से सदा के लिए तुम्हारा हाथ मांग लूँगा... वों मुझसे इंकार नहीं करेंगी... - चलो ,रहने दो ... बड़े देखे सदा के लिए हाथ मांगने वाले... तुम्हारे जैसे दिन में कितने आते -जाते रहते हैं... इन शब्दों को कहते हुए मेरा मन बैठा जा रहा था... जिसके लिए दिल में athah मोहब्बत थी, उसीके लिए जीभ पिघलने का नाम नहीं ले रही थी... शायद जीभ को भी मजाक सूझ रहा होगा... मैंने बड़ी मुश्किल से अपने दिल पर काबू करने की सोची... दिल तो बेताब था... मेरी हालत बहुत ख़राब थी... राजू ने पीछे से छोड़कर मुझे आगे से पकड़ लिया था... बिना किसी की परवाह किए, वह मेरे होठों को चूमने लगा... मेरे बेकरार दिल को करार आने लगा... राजू थर-थर कांप रहा था... मैंने ख़ुद को उसके सुपुर्द कर दिया... वह पागलों की तरह प्यार कर रहा था... उसने जब मेरे उभारों को सहलाना शुरू किया तो मेरे जिस्म में आग की लपटें उठने लगीं... उन लपटों में मेरा समूचा वजूद झुलसने को बेताब होने लगा... राजू के प्यासे होठ जब मेरे कोमल अंगों पर फिसलने लगे तो मैं ख़ुद को असहाय महसूस करने लगी... मैंने मचलते हुए कहा- - अब रहने भी दो... कोई देख लेगा तो बदनाम हो जायेंगे... बेवजह बदनाम होने से किसी को क्या मिलेगा ? राजू- इसी लिए तो पहले जी भरके प्यार करने की तमन्ना है... इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते ... एक न एक दिन तो सबको पता चल ही जाएगा... - मुझे बहकाओ मत ... मैं वैसे ही बहुत बेचैन हूँ.... -राजू- हमारे दिल में जो आग लगी है, तुमने उसका भी कुछ अंदाज़ लगाया है...? - मुझे अकेली छोड़ दो .... - इस तरह मंजिल के करीब आकर मई वापस नहीं लौटना चाहता ...

भाग -५१

सच टो ये है की राजू मेरे तन-मन में बस गया था... वह उठकर जा चुका था ... मगर जाते -जाते मेरे चैन -करार को भी लूटकर ले गया... पता नहीं उसमें ऐसा क्या था की मैं चुम्बक की तरह चिपकती चली जा रही थी... उसके सिवाय मुझे कुछ याद नहीं था... मेरी बाली उमर थी...तभी से यह इश्क का रोग लग गया...
मालती- फ़िर राजू से मुलाक़ात कैसे हुई?
आशा- हमारे घर पर भैंस पालने का कार्य होता था... मैं भैंस बंधने के लिए खेत पर गयी हुई थी... तभी मुझे किसीने पीछे से डरा दिया... किसी की

Friday, July 18, 2008

भाग -५०

तभी तो माँ ने उससे पूछा था-
- तुम कहाँ रहते हो बेटा ?
राजू- कोलकाता में रहता हूँ माँ जी...
- अरे वाह , इतने बड़े शहर में ?वहां कुछ काम कर रहे हो ?
राजू- हाँ , मा जी ...पक्की नौकरी है... दिन में नौकरी करता हूँ और रात को पढाई भी करता हूँ... टाइम नहीं मिलता
न ,इसलिए प्राइवेट पढाई करता हूँ ...
-ये बहुत खुशी और गर्व की बात है... तुम जैसे होनहार लड़के आजकल मिलते ही कहाँ हैं ... घर-परिवार वाले सब साथ में ही रहते होंगे....
राजू- नहीं, मैं अकेला ही रहता हूँ... वे सब तो गाँव में ही रहते हैं...
कहने के बाद राजू ने मेरे दोनों उभारों को अपने हाथ से रगड़ दिया... सच कहूँ ,उस वक़्त थोड़ा दर्द जैसा तो हुआ था लेकिन मजे की मत पूछ ... मेरी रग -रग में खुशियों का संचार हो रहा था... बड़ा आनंद आया...माँ उससे कह रही थी-
- काम-धाम के साथ-साथ अपनी सेहत पर भी ध्यान दिया करो... कितने दुबले -पतले हो रहे हो ?
राजू- बस ऐसे ही है... क्या बताऊँ, होटल का खाना तो ऐसा ही होता है... कितना भी खाओ मगर पेट को लगता ही नहीं...कभी-कभी घर पर खाना बना लेता हूँ... मगर , कैसा बनता होगा ,आप अनुमान लगा सकती हैं...
-ठीक कहते हो बेटा... खाना बनाने का काम मर्दों का नहीं होता... तुम शादी क्यों नहीं कर लेते...?
राजू- क्या बताऊँ , माँ-बाप ने कई लड़कियां देखि हैं मगर कोई जंचती ही नहीं है... किसी में कोई कमी रह जाती तो किसी में कुछ...ये सब छोडो ...
- कोई योग्य कन्या देखकर शादी कर डालो... सम्पूर्ण कोई नहीं होता... यहाँ तक की भगवान् भी नहीं...
राजू-अब कोई मुझे भी तो जमनी चाहिए...
यह बात मेरे मन में घर कर गयी... जी चाहा की उससे अपने बारे में सवाल कर डालूँ ... पूछूं की मेरे बारे में क्या ख्याल है ज़नाब... मैंने कोलकाता की हुगली नदी के बारे में सुन रखा था... मेरे मन में शहर की रंगत घूमने लगी... मैं मन ही मन सुहागरात की कल्पना कर रही थी... माँ और राजू न जाने क्या-क्या बातें करते रहे... मैं तो मधुर पलों को भोगने की कल्पना करती रही ... मैं सोच रही थी की राजू और मैं कोलकाता की नदी के किनारे आलिंगनबद्ध होकर प्यार की गहराई में खोये हुए हैं... राजू मेरे सीने को सहला रहा है... मैं जब उत्तेजित होने लगी तो वह मेरे होठों को चूमने लगा... मेरे मन विचलित होने लगा... मैं उसके संवेदनशील अंगों से छेड़छाड़ करने लगी... मैं ख़ुद हैरत में थी की यह मेरे साथ क्या हो रहा है? मेरी लाज शर्म सब ख़त्म हो रही थी... हया तो औरतों का गहना होती है ... मेरा यही गहना मुझसे छूटता जा रहा था... राजू मेरे वजूद पर छाती जा रही था... हेरात की बात तो ये थी की मना करने के बजाय मैं उल्टे उसका सहयोग कर रही थी... हर आदमी अपनी राह आ -जा रहा था... हमारी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं था...
उसकी बातों को बीच में ही काटकर मालती बोली-
-सबका ध्यान तुम्हारी तरफ़ नहीं था या फ़िर तुम्हारा ही ध्यान उनकी तरफ़ नहीं था?
आशा-तुम ठीक कहती हो... उस वक़्त मुझे ज़रा भी होश नहीं था... वैसे तो मैं अपने घर पर ही थी लेकिन मेरे दिलो-दिमाग राजू के साथ थे... मैं राजू के साथ सपनों की दुनिया में खोकर प्यार मोहब्बत की दुनिया में मगन थी...









































Wednesday, July 16, 2008

भाग- ४९

मालती-उस समय दिल के अन्दर तो खलबली मची होगी?


आशा- इसमें कोई शक नहीं है... बहत भरी उथल-पथल थी... दिल धड-धड बज रहा था... राजू दूध पीने में व्यस्त था ... हलाँकि चोर नजरान से मेरी तरफ़ ही देखता था... थोडी ही देर में मुझे यह एहसास हो गया की वह मुझमें मुझसे भी ज्यादा दिलचस्पी ले रहा था... मैंने राहत की साँस ली... मैंने एक सहेली से सुन रखा था की मर्दों के सामने छुई- मी बन्ने में ही फायदा रहता है... अगर लड़की पहले से अपने प्यार का इज़हार करती है तो से बेहया आर चालू समझा जाता... कम उम्र में ही इस बात को मैंने गाँठ बाँध लिया था... तभी तो मैं राजू के सामने नज़रें झकाये हुए थी... चारपाई काफी बड़ी थी... मैं उस पर लेती हुयी थी और राजू उसी पर बैठा हुआ था...वह धीरे -धीरे पीछे की तरफ़ हट ता जा रहता, मैं आगे की तरफ़ सरकती जा रही थी... अहिस्ता-अहिस्ता मई और वों वहां तक पहुँच गए की मेरे सीने के उभार उसके शरीर से स्पर्श करने लगे थे ... वह बड़ा चालाक निकला ... सबसे बात करने के साथ-साथ वह अपनी कोहनियों से मेरी गोलाइयों को भी दबाता जा रहा था... मेरी माँ को भी उसने बातों में उलझा लिया थाउस वक़्त हम लोग ऐसे स्थान पर थे की मुझे पीछे की तरफ़ से कोई नहीं देख सकता था... पीछे की तरफ़ एक छोटी सी दीवार थी... आगे की और सब लोग बैठे थे... राजू कह रहा था-


- मुझे इस गाँव के लोग बहुत अच्छे लगे ... अतिथि सत्कार तो कोई इनसे सीखे...


उसकी बात को काटते हुए मेरी माँ ने बीच में ही कहा था-


- क्यों बेटा, तुम्हारे गाँव में क्या नातेदारों को भगा दिया जाता है...


राजू - ऐसी बात नहीं है माँ जी, खैर भगाता तो कोई किसी को नहीं है ... मगर प्यार भी देखा जाता है ... हमारी तरफ़ लोग आपकी खातिरदारी करेंगे ,राजी-खुशी की दो चार बातें पूछने के अलावा उनके पास इतना भी टाइम नहींहोता की आपके पास घड़ी -घंटा बैठकर दुःख-सुख की बात कर सकें ...और तुम्हारे यहाँ तो देखता हूँ , लोग बड़े आदर के साथ बुलाते है... पास बैठकर घर- परिवार की बातें करते हैं... यथासम्भव आवभगत भी करते हैं... मुझे तो यहाँ का माहौल बहुत बढ़िया लगा है...
अपनी बात पूरी करने के बाद उसने बड़ी सफाई से अपनी कोहनी मेरी गोलाई से रगड़ दी थी... मेरे पूरे शरीर में बिजली सी कौंध गयी...मुझे इतना मज़ा आया की मैं और आगे खिसककर रगड़ पैदा करने लगी...माँ कह रही थी-
- ऐसी कोई बात नहीं है बेटा... टाइम की साँची है... यहाँ पर बेरोजगार लोग ज्यादा हैं ... उनके पास वक़्त की कमी नहीं होती... तुम्हारे यहाँ लोग अपने -अपने कामों में लगे रहते होंगे... यहाँ फालतू पड़े हैं तो क्या करेंगे... मटरगस्ती से भी जाएँ ... खाली बैठे नोनके में हाथ .... अब बातों में ही लगे रहोगे या कुछ खाओगे, पिओगे भी ? तुम जैसे जवान लड़के एक किलो दूध यूँ ही पी जाते हैं... आँख मीचकर... तुम्हें एक गिलास ही भारी पड़ रहा है...
राजू ... अब नहीं पी पाऊंगा... ये बिल्कुल असली दूध है...इसे ज्यादा पिऊंगा तो पेट चल जाएगा...
अब मेरा उभार उसके जिस्म से रगड़ पैदा कर कामोत्तेजना बढ़ाने लगा...मैं अन्दर ही अन्दर पिघलने लगी... टूट-फ़ुट शुरू हो चुकी थी... मेरे दिल से मेरा नियंत्रण हटने लगा... इस बदलाव से मैं परेशान नहीं थी... मेरे मनमें फूल झाडियाँ छूट रही थीं ... राजू का चेहरा मेरी और नहीं था... मेरा जी चाहा की राजू के गालों पर चुम्बनों की बौछार कर डालूँ ... उसकी बाहों में समा जाऊँ ... उसके होठों का रसपान करती रहूँ... वह बड़ा वाक्पटु था... माँ भी उसके झांसे में आ चुकी थी...


Tuesday, July 15, 2008

भाग-48

आशा-बताना तो पड़ेगा... मैं तुम्हें सब कुछ बताउंगी... यूँ लगता है जैसे मेरे गले में कुछ अटक गया है... जब तक यह बाहर नहीं निकलेगा तो प्राण भी नहीं बचेंगे... ना चाहते हुए भी मुझे ये सब बताना पड़ेगा...
मालती हैरत से उसकी बातें सुन रही थी... वह आशा को ऐसे देख रही थी , जैसे की उसने किसी अजूबे को देख लिया हो... अजूबे की तो बात ही थी, आशा इतने मूड थी जितनी मालती ने उसे कभी नहीं देखा... सिगरेट सुलगाने के बाद आशा कह रही थी-
-उस दौर में मेरी सुन्दरता के चर्चे हर गली-चौराहे पर होते थे ... ज्यादातर छिछोरे किस्म के लड़के आते जाते मुझे छेड़ते रहते थे... कुछ लोग ऐसे भी मिले जो मुझे हमेशा के लिए अपनी बनाने के लिए बेताब थे... लगती हो...
मालती- तुमने किसका हाथ थामा ? जब ज़वानी आती है तो कानी भी सवर जाती है... तुम गज़ब का पटाखा लगती होंगी... आज भी कम सुंदर थोड़े ही लगती हो...
आशा- क्या मालती , तुम भी..
मालती- सच ... अगर मैं लड़का होती तो तुम्हें हासिल किए बिना नहीं रहती... तुम से ज्यादा खतरनाक तुम्हारी अदाएं हैं.... कौन नहीं जानता की जितने भी पुराने खिलाड़ी हैं, वे सब के सब आज भी तुम पर जान निसार करते हैं... नई- नई लड़कियां भी तुम्हारे सामने फेल हो जाती हैं...
आशा- अब मेरी तारीफ ही करती रहोगी, या फिर ?
मालती- सॉरी ... अब कहो ...मैं थोडी सी पीते ही बहक जाती हूँ...
आशा- हमारे गाँव की एक लड़की की शादी हुई थी... जब दूसरी बार उसे लेने के लिए उसका पति आया तो साथ में कुछ अन्य लोगों को भी लाया था...वे सब गाँव में कई दिन रुके...उन्हीं में से एक था, राजू... गोरे रंग के राजू ने मेरे ऊपर जादू सदी कर दिया था... मैं उसे अकेले -अकेले निहारते रहती रहती थी... वह बड़ा हंसमुख था... सबसे मजाक करता फिरता था... मैं उससे बात करने का बहाना नहीं खोज पा रही थी... वह तो इस बात को जानता भी नहीं था की आखिरकार मैं उसे इस तरह चाहने लगी हूँ.






































































































Monday, July 14, 2008

भाग -४७

जब से मैं अमीना शेख का कोठा छोड़कर तुम्हारे कोठे पर आई हूँ तबसे मैंने उसी तरह सोचना शुरू किया, जैसे की तुम सोचती हो... अपने दिल की कभी कोई बात नहीं सुनी मैंने...
आशा- बुरा मान गईं क्या...
मालती- कभी माना है क्या ?
आशा- कुछ और कहो न, प्यार के बारे में...
मालती- साडी दुनिया जानती है... यह वों हसीं एहसास है, जो एक न एक बार सबके दिल पर दस्तक देता है... जिसके हिस्से में जो लिखा होता है, उसे मिल जाता है... खैर , ये सब छोडो ... अपनी कहो ...तुम कुछ बता रही थी...
आशा- क्या कहूँ, क्या छिपाऊं ...इस कमबख्त इश्क ने ही मुझे वेश्याओं की ठेकेदार बना दिया है... अगर इस रोग ने मुझे न सताया होता ,तो आज औरों की तरह मैंने भी अपना घर बसाया होता... अरे वाह, क्या जोर की तुकबंदी बन गई है... ये तो शेर बन गया...
मालती- और , शेर लिखने वाले क्या दूसरी दुनिया से आते हैं... वे भी इसी तरह लिखते-लिखते सीख जाते हैं... तुम क्या किसी से कम हो... छोटी सी जिंदगी में किसी से गिला शिकवा करने से क्या हासिल होगा ? जो मिले उसे अपना बनाते चलो ... कई साल तक जिल्लत भरी जिंदगी जीने क बाद मैं तो इसी नतीजे पर पहुची हूँ... हलाँकि कोई बेवजह ऐसा नहींकरना चाहता होगा... मगर फिर भी , गिले -शिकवे करने पड़ जाते हैं...
आशा- और उनके ठोस कारन भी होते होंगे... इसके बावजूद जितना हो सके बचना ही चाहिए...यही न ?
मालती- आज ऐसा क्या हो गया जो तुम इतनी गंभीर चर्चा करने बैय्ह गई...
आशा- आज मत पूछो ... किसी हमारे वजूद को ललकारने की कोशिश की है...
मालती- सिर्फ़ कोशिश ही हुई है या फिर उसे कामयाबी भी मिल गई है...?
आशा- उसने कोशिश की , क्या यही हिमाकत कम है ?
मालती-कौन है वों बदनसीब ?
आशा- अपनी चंदा...
मालती- क्या कहती हो ? वह तो बहुत ठीक ठाक थी... उसने क्या कर दिया?
आशा- उसे एक लड़के से प्यार हो गया ... अब वह उसके साथ शादी करना चाहती है...
अपने शब्द पूरे करते ही वे दोनों ठहाके लगाकर हंस पड़ीं...मालती ने दो पैग और तैयार कर लिए ... आशा बेशक हंस रही थी लेकिन दर्द साफ़ झलक रहा था... जी भरके पीने क बाद भी उसकी प्यास बढती चली जा रही थी... दुःख तो मालती को भी था... वह चंदा क व्यवहार से खुश रहती थी, मगर प्यार वाली बात से उसको इल्म हो गया की अब चंदा की खैर नहीं है... वह आशा क गुस्से को अच्छी तरह से जानती थी... बात को बदलने क इरादे से उसने कहना शुरू किया-
- तुम अपने बारे में कुछ बता रही थीं।?
आशा जैसे नींद से जाग गई... जल्दी से गिलास में भरी शराब को ख़त्म करते हुए बोली-
- हाँ , हाँ-हाँ , मैं किउच कह रही थी...कहाँ थी मैं...?
- मालती- यदि तुम चाहो तो अब आराम कार्लो ... हम बाद में भी बात कर सकते हैं...
-आशा- तुम लोगों की इसी अदा को हम अभी नहीं सीख पाए...पहले ख़ुद ही इसरार करते हैं और फिर ख़ुद ही इनकार कर देते हैं की रहने दो... अरे भाई, कैसे रहने देन और क्या रहने देन ?

भाग-४६ चनेवाली

यह उस समय की बात है जब आशा जवानी के नशे में चूर थी... उसका प्रत्येक अंग गदराया हुआ था... अपने घर से वह बाहर निकलती तो सैकडों भँवरे उसका रस चूसने के लिए आगे -पीछे घूमने लगते थे... आशा कभी किसी को भाव नहीं देती थी... वह जब धम्म से इधर-उधर निकलती तो तो देखने वालों के सीने पर सांप लेट जाया करते थे... वह मुस्कराती तो जैसे गुलशन में फूल खिलने लगते थे... आवारा लड़के उसे देखकर सीटियाँ बजाने लगते थे... वह थी ही गज़ब की खुबसूरत... वह उन्ही पलों के बारे में सोच रही थी की मालती ने उसको टोक दिया- - क्या सोच रही हो ? आशा- बहुत पुराणी बातें हैं ... -कोई बात नहीं... मन का सारा दर्द निकाल फेंको ... - बड़ा अच्छा समय था... जीवन में हर तरफ़ खुशहाली ही खुशहाली थी... दूर- दूर तक गम का कोई नामो-निशाँ भी नहीं था... मेरी सभी सहेलियों ने कोई न कोई बॉय फ्रेंड बना रखा था... किसी -किसी के तो कई -कई थे... मेरी उम्र भले ही छोटी थी मगर मेरा शरीर बजाब का था... इसी कारन १३ बरस की उम्र में ही मैं २० साल की करारी जवान नज़र आती थी... मेरा बदन भरा हुआ था... लोग मेरी नादानी का फायदा भी उठाना चाहते थे, लेकिन इस सबसे अनजान मैं अपनी ही दुनिया में मगन थी... मुझे इस बारे में सोचने की जरा भी फुर्सत नहीं थी की कोई मेरे बारे में क्या सोचता है... मालती- आह, तुमने मुझे मेरी पुराणी दुनिया की सैर करदी॥ वे दिन बड़े याद आते हैं , बस लौटकर ही नहीं आते... आशा- ठीक कहती हो... दुःख तो इस बात का भी होता है अच्छे दिन बहुत जल्दी व्यतीत हो जाते हैं और बुरे दिन काटे नहीं कटते ... हम जो चाहते हैं, ज्यादातर उसके विपरीत ही क्यों होता है ? मालती- - यही तो प्रक्रति का रहस्य है... यह हमेशा अन सुलझा ही रहता है... शायद पहले से ही इंसान के दिमाग को लिमिटेड कर दिया जाता होगा, तभी तो हम कुदरत की किसी भी बात को समझ नहीं पाते... सिर्फ़ कयास लगते रहते हैं... पता नहीं सच्चाई उनके कितनी करीब होती है, और होती बी ही है की नहीं... आशा- अरे वह, तुम बहुत अच्छी बातें कर लेती हो... मेरे यहाँ पर काम करते हुए तुम्हें बरसों हो गए मगर आज तक तुम्हारी खासियत के बारे में पता ही नहीं चल पाया - वों शेर तो तुमने सुन ही होगा, न तू खाली , न हम खाली... आशा- हाँ , ये ... तुम्हें गैरों से कब फुर्सत , हम अपने गम से कब खाली... चलो बस हो गया मिलना , न तुम खाली , ना हम खाली... बहुत खूब...अच्छा है... शेरो-शायरी की दीवानी तो तुम शुरू से ही हो। malti - महफ़िल में जान तभी आती है जब तुम होती हो... आशा- ये तो बस प्यार है... malti- प्यार, यही तो सबसे खतरनाक है... यही शब्द इंसान के जीवन में

खलबली मचा देता है... किसी की जिन्दगी को खुशहाल बना देता है तो किसी को बर्बाद भी कर डालता है...

आशा- तुमको प्यार के बारे में इतनी जानकारी है ? मेरे कोठे पर रहकर भी?

मालती- जी नहीं... यहांतो हमने वही किया,जो आपने आदेश दिया ... इसके अलावा तो कभी कुछ सोचा भी नहीं ...

Saturday, July 12, 2008

भाग -४५



मैं कुछ ग़लत कह रही हूँ क्या ?
आशा- मेरे जले पर नमक छिड़क रही हो ? तुम तो जानती हो की इन सब चीजों में मेरा विश्वाश नहीं है...
मालती-कुछ बात तो है ... अगर दाल में काला नहीं होता तो तुम इस तरह नहीं उखड जातीं ... मुझसे छिपाकर क्या फायदा उठा लोगी ?दाई से पेट छिपाने से क्या हासिल होगा
आशा- इस समय मुझे मजाक अच्छा नहीं लग रहा ?
मालती- मजाक करने की मजबूरी है... वरना तुम कहोगी की कुछ किया नहीं ... मैंने सुना है की जब दिल में दर्द हो तो हसने- हसाने से बड़ा आराम मिलता है... सुना तो यह भी है की दिल के गुबार को किसी अपने के सामने कह देने भर से ही मन का बोझ काफी हल्का हो जाता है...
आशा मंत्रमुग्ध होकर मालती की बातों को सुन रही थी... पहले कभी ऐसा नहीं होता था... आशा सुनकर चुप होने वालों में से नहीं थी... वह तो एक की चार सुना दिया करती थी... उसकी खामोशी मालती को भी आशचर्य चकित कर रही थी... बूढी मालती को यह जानने में ज्यादा समय नहीं लगा की कोई न कोई राज़ जरुर है... वह उसे और कुरेदना चाहती थी... तभी तो वह उसके सिरहाने बैठ गई... उसके सर को अपने घुटनों पर रखकर मालती उसके सर को सहला रही थी... तीन पैग भी आशा को निराशा के गर्त से बाहर नहीं निकल पाये थे... वैसे भी शराब से किसी का दुःख कभी कम हुआ है क्या ? पीना तो महज़ एक बहाना होता है... एल्कोहल का असर थोडी देर के लिए दिमाग को समस्याओं से बहका देता... जब उसे ध्यान आता है तो पता चलता है की समस्या पहले से भी बलवान हो चुकी होती है... मालती का स्नेह पाकर आशा का पत्थर दिल एक बार फिर पिघलने लगा... उसने मालती से दो पैग तैयार करने को कहा... मालती ने तुंरत आदेश का पालन किया... अब वे दोनों साथ-साथ शराब पी रही थीं... मालती को एहसास हों रहा था जैसे की आशा उससे कुछ छिपा रही है... उसने हिम्मतकरके पूछा-
- यूँ कबतक अकेले-अकेले घुटती रहोगी ?
आशा- मेरा जीवन एक जलता हुआ ज्वालामुखी बन चुका है... जब-जब ठंडी हवा बहेगी, तब-तब आग और भी भड़कती जायेगी ... इस आग के बुझने की कोई आशा नहीं है...
मालती- ऐसा क्यों कहती हो , तुम तो ख़ुद आशा हो ...
आशा- नाम में क्या रखा है ? कुछ नहीं... सब खोखली बातें हैं ...
मालती- आज इतनी निराशा का कारन क्या है ? तुम को इतना अपसेट पहले कभी नहीं देखा... अगर तुम नहीं बताना चाहतीं तो कोई बात नहीं , मैं जिद नहीं करुँगी...
आशा- मैं क्या कहूँ ,क्या न कहूँ कुछ समझ नहीं पा रही हूँ...
मालती- भूमिका की तलाश मत करो... शब्दों के चयन में यदि कभी परेशानी महसूस हो तो अपने आपको दिल के हवाले कर देना चाहिए...
आशा- मैं अपने आपको सबसे कठिन दौर में पा रही हूँ ...
मालती- मैं हूँ न तुम्हारे साथ...
आशा- पहली बारऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं जिन्दगी की सबसे बड़ी और अहम् जंग को हार गई हूँ ...
मालती- कभी- हार भी जीत से खुबसूरत और फायदेमंद होती है... हो सकता है की तुम्हारी हार भी कुछ ऐसी ही हो... मेरा यकीन है की तुमारा वास्ता भी कुछ ऐसी ही हार से पड़ा होगा...
आशा गहरी सोच में पड़ गई...उसके सामने फ़िर वोही द्रश्य घूमने लगे, वो द्रश्य जिन्हें याद आते ही उसकी रूह तक कांपने लगती थी...








भाग -४४

चंदा- सदा से मैं ऐसी नहीं थी मौसी...हालात ने जो बनाया ,वाही बनती चली गयी...आज शायद वक़्त की यही मांग है...तुम भी समय की पुकार सुनना और समझना सीखलो मौसी... मैं अब ज्यादा दिनों तक खुली हवा में साँस नहीं ले सकती... तुम्हरी नफरत का जो भी शिकार हुआ है, उसका हश्र किसे पता नहीं है?
आशा- यह सब जानने के बाद भी तुम ऐसी बात कहने की हिम्मत कैसे जुटा पा रही हो ?
चंदा- यह प्रेम की शक्ति है... जिसे न तुमने कभी जाना ,न महसूस किया...
आशा- प्यार करने वाले रेल की पटरी पर पड़े मिलते है॥
चंदा-बेशक , फिर भी प्यार मिटता नहीं... कोई प्रेमी किसे रुकता नहीं... यह ताकत नहीं तो क्या है?
आशा- यह ताकत नहीं मूर्खता है... निरा पागलपन है...
चंदा-संतुलन बनाने के लिए कुछ पागलों की भी जरुरत पड़ती है... अगर सभी ठीक हो तो पागल की पहचान कैसे की जायेगी...मेरा मानना है की मुझे एक मूर्खता करने दो ... इस एहसान के बदले मैं जिंदगी भर जो चाहो कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ... अगर तुमने मुझे इस कोठे से रिहा कर दिया तो मैं कोई अच्छा सदी काम कर लुंगी ... मैं और विनीत मिलकर रोजाना जो भी कमाएंगे ,उसका आधा हिस्सा जीवन भर तुम्हें देते रहेंगे... मैं इस कोठे पर रहकर तुम्हारे लिए जो कमाकर दूंगी, भले यह रकम उससे कम होगी, मगर मैं ज्यादा से ज्यादा मेहनत करके तुम्हारा घाटा पूरा करने की कोशिश करुँगी... ये मेरा वादा रहा... फिर भी यकीन नहीं तो मुझसे कोर्ट के पेपर पर दस्तखत करवा लो... मैं हर तरह से तैयार हूँ ...बस मुझे मेरा विनीत देकर आजाद करदो... मैं आजाद होकर इस खुले आसमान में उड़ना चाहती हूँ...
आशा सोच में पड़ गई... चंदा को कमरे में बंद करके वह अपने पलंग पर आकर धम्म से गिर गई... उसने व्हिस्की की बोतल खोलकर एक लरज़ पैग तैयार किया और बिना पानी डाले ही पी गयी... उसका दिल बहुत जोर-जोर से उड़ रहा था... उसने अपने सीने में जलन सी महसूस की तो एक पैग और पी लिया...एक सिगरेट सुल्हाकर धुआ उडाना शुरू कर ,मगर बेचैनी बढती चली जा रही... चंदा की गिडगिडाना उसे हर पल परेशां कर रहा था... कुछ अतीत की यादें उसके जेहन में गर्दिश कर रही थीं... वह उन यादों से जितना बचने कम प्रयास करती, उसे उतनी ही नाकामी मिल रही थी... दिल भी बड़ी अजीब शै है... यह जब भी बागी होता है , बस हो हो जाता है... दिमाग भी कभी-कभी खुराफात कर डालता है... उस समय सौ चोट सुनार की तो एक चोट सुनार की, वाली बात हो जाती है... इस समय आशा के साथ यही तो हो रहा था ... दिल तो पुराणी किसी भी बात को सुनने के लिए तैयार न था लेकिन दिमाग पूरी तयारी के साथ हर लम्हे की दास्तान सुनाने के लिए बेताब था... दिमाग अब दिल को अतीत की हर दास्तान संगीतमय सुनाने लगा... दिल फिर घबराया ,आशा ने एक सेविका को आवाज़ दी....सेविका तुंरत दौडी चली आयी ... उसका नाम मालती था...वह एक रिटायर वैश्या थी... आशा उसका ही थोड़ा बहुत सम्मान करती था... हर उलझे हुए मसले पर वह मालती से ही सलाह -मशविरा किया करती थी ... वह मालती से बोली-
- तबियत कुछ ठीक सी नहीं लग रही है... बहुत दिल उड़ रहा है...
मालती- कहो तो डॉक्टर को बुलवा दूँ...
- यह मर्ज़ कुछ अलग दिखायी देती है...
मालती- ऐसी आज क्या परेशानी आन पड़ी, जो डॉक्टर भी ठीक नहीं कर पायेगा...अब इस उम्र में तुम्हें किसी से प्यार तो होने से रहा... क्योंकि प्यार ही एक ऐसा रोग है जिसकी दावा यार के आलावा किसी वैध -हकीम या डॉक्टर के पास नहीं मिलती...

Friday, July 11, 2008

Thursday, July 3, 2008

भाग ३५ ख
मेरे पास तुम्हारे रूप में ऐसा नायाब हीरा मौजूद है ,जो सारेजहाँ में शायद कहीं नहीं होगा...विनीत-बस करो ,अब रहने भी दो...आज की तारिख में इंसान बनकर जीना भी बड़ा मुश्किल है...ये एहसान होगा, मुझे इंसान ही बना रहने दो...देख रहा हूँ की तुम्हारी विचारधारा बिल्कुल बदल गई..तुम्हारी जुबान से रस टपक रहा है ...अब तो मान गई प्यार की ताक़त को..चंदा-सचमुच ,यह मेरे लिए अनोखा और अभूतपूर्व अनुभव है...ऐसा तो बस जादू से ही सम्भव हो सकता है...विनीत- ऐसा कहानियो में ही हो सकता है,यही सोच रही हो न तुम ?सच्चाई इससे अलग है...मोहब्बत का स्थान सबसे ऊपर होता है... अगर ईमानदारी से प्यार का रिश्ता निभाया जाए तो सबका जीवन स्वर्ग बन जाए ...
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कहानी .भाग -३५क
सोच रही हो...आज तुम सोच -विचार करना छोड़ दो ...अब से यह मेरा काम है...अभी-अभी कहाँ थी तुम ?चंदा-सच कहूं तो मैं पुराने दिनों की यादों में खो गई ...काश,तुम उस समय मिली होतीं...तब मेरा यौवन गज़ब था...विनीत-अच्छा हुआ जो तुम घूम -फिरकर फ़िर वहीं पहुच गई ...अब मुझे उन हालातों के बारे में बता ही दीजीये जिसकी वजह से तुम्हें वैश्या बन्ने के लिए मजबूर होना पड़ा?चंदा-जब मैं अपने अतीत पर निगाह दौड़ती हूँ तो बड़ी कोफ्त होती है...एक के बाद एक सारा मंज़र मेरी आंखों के सामने घूमने लगता है ...मालिक ऐसा जुल्म किसी और पर न होने दे...मैं तो खैर जैसे-तैसे बर्दाश्त कर गई..शायद कोई और इसे सहन नहीं कर पायेगी.शायद मैंने पुराने जन्म में कोई बड़ा पाप किया होगा... जिसकी सज़ा मुझे इस जन्म में मिल रही है...हो सकता है ,मैंने कोई पुण्य भी किया होगा,तभी तो उसने मेरे लिए तुम्हारे जैसा फ़रिश्ता भेज दिया ...अब तक मैं ऊपर वाले से बहुत गिला-शिकवा किया करती थी...उसके लिए अब माफ़ी मांग लेती हूँ..तुम्हारे रूप में उसने मुझे वो तौहफा दिया है, जिसका दुनिया की किसी भी मण्डी में कोई मोल नहीं है ...
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कहानी .भाग 35
वो ज़माना भी क्या ज़माना था...साडी दुनिया के रंजो गम से दूर वह अपनी बनाई हुई एक काल्पनिक ,मगर खूबसूरत दुनिया में विचरण करती थी...उसकी जालिम चाची उसे कम परेशां नहीं करती थी लेकिन आज के दर्द से वो दर्द बहुत कम हुआ करता था...एक कान से सुनकर वह दूसरे कान से निकाल दिया करती थी...जब वह सर पर दो चोटियाँ बंधकर घर से निकलती तो कई मनचलों के दिल पर साँप लेटने लगते थे...वह नीचे सर झुकाए अपने रस्ते पर चलती रहती थी..उसके सीने के उभार लोगो को अपनी तरफ़ ज्यादा आकर्षित करते थे...जब कभी वह स्नान करने के बाद अपनी जुल्फों को झटका देती तो देखने वाले देखते रह जाते थे...उसे ख्यालों में गुम देखकर विनीत भी सोच में पड़ गया...प्यार से उसके गालों को सहलाते हुए पूछने लगा-- मेरी जान न जाने कहाँ खोई हुई है ?मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ और तुम पता नहीं किसके बारे में p.to.
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Wednesday, July 2, 2008

भाग ३४ ख
अब चंदा विनीत को बिल्कुल अपनी जैसी लगने लगी थी...शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होने के बाद उनके बीच प्रेम अब और भी प्रगाढ़ हो गया था... वह बार -बार उसके गलों को चूम रहा था ...चंदा मन ही मन यह सोच रही थी की विनीत ने उसके पास आने में कितनी देर करदी..अगर उसे आना ही था तो उस समय आता जब वह जवानी के नशे में चूर thi...
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भाग ३४क
विनीत का दिमाग बड़ी तेजी केसाथ चल रहा था...विपरीत समय में वह बहुत अच्छी तरह से कार्य करता था..उसके सभी यार -दोस्त इस बात के लिए उसकी तारीफ भी करते थे...कुछ देर के बाद वह चंदा से बोला--अच्छा, ये बताओ तुम्हें यहाँ से बहार निकलने की अनुमति कब मिलती है?चंदा-ऐसी कोई बात नही है..जिन पर शक नहीं होत, वे कभी भी और कहीं भी जा सकती है...उसके लिए एक परफेक्ट कारन बताने की जरुरत पड़ती है...इसके बावजूद भी जो लड़की यहाँ से बहार जाती है ,उस पर नज़र रखने के लिए दो चार मुस्टंडे तैनात किए ही जाते हैं...यदि आशा को जरा भी भनक लग गई तो फ़िर हम दोनों का भगवान् ही मालिक है...ये लोग बड़ी दरिंदगी से पेश आते हैं... हाथ -पाँव काटने और आँख निकलने से भी नहीं हिचकिचाते..एक बार मैंने अपनी आँखों से ख़ुद देखा था..आशा ने एह ग्राहक को पकड़ रखा था और उसके खास बन्दे ने ग्राहक के दोनों हाथ कट दिए ...उसकी चीखो से पूरी बिल्डिंग हिल गई मगर इन जालिमों का दिल नहीं पसीजा...उसका इतना बुरा हाल किया की याद आते ही सिहर उठती हूँ...पढ़ें भाग ख
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मेरे मन को तुम तो इतना भा गए हो
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1, 2008

कहानी भाग-33
चंदा-तुम्हारी इसी सादगी पर तो मर मिटने का दिल करता है ...तुम बहुत प्यारे हो...मालिक ने तुम्हें मेरे लिए ही बनाया है... इस कोठे पर कितने लोग आए कितने गए, लेकिन कभी किसी से मोहब्बत नही हुई ...तुम सबसे अलग हो ...अब जबकि ,प्यार का ये सिलसिला शुरू हो ही गया है तो इसको ताउम्र थमने नही देना है...साथ में यह भी ध्यान रहे की हमारे बीच पनप रहे पवित्र प्यार का कभी मजाक न उड़ने पाए॥हम जैसी वेश्याओं का जीवन वैसे ही behad कष्टप्रद और काँटों भरा होता है...हमारे प्यार की दास्ताँ पर इस दुनिया में कोई यकीन नही कर सकता...तुम्हें करना होगा...अगर मुझे इस नर्क से सचमुच मुक्ति दिलाना चाहते हो तो फ़िर अपने हर वाडे को निभाना होगा...हम दोनों ही जानते है की हम जो करने जा रहे हैं वो इतना आसान नहीं है...विनीत-भले ही मुझसे वादा न कराओ ,आँखें बंद करके भरोसा कर लो ...ये विनीत अपनी जान पर खेल सकता है...आग के दरिया को चीरकर निकल सकता है ,मगर अपने प्यार के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता...चंदा-तुम सदा ऐसे ही बने रहना ...आज से तुम मेरे जीने का मकसद बन गये हो... तुम्हारे लिए मैं भी अपनी जान पर खेल जाउंगी...अपने इस पेशे को छोड़कर मैं कुछ भी कर सकती हूँ...उसकी baton में बड़ा रस था ...विनीत बड़े ध्यान से सुन रहा था...अब वह और भी जोश में आ गया...चंदा का बदन pto
Posted by geet gazal at 3:22 AM
भाग -३३ क
कामोत्तेजना में झुलस रहा था...चंदा का यौवन इस वक़्त विनीत की गिरफ्त में था...वह खुश थी...विनीत उसके बदन को सहला रहा था...चंदा ने खामोश रहना ही बेहतर समझा...नाजुक पलों का महत्त्व उससे ज्यादा भला कौन समझ सकता था...थोडी देर के बाद उन दोनों की सांसे फूलने लगीं...चंदा ने अपने बैग से कंडोम निकलकर विनीत के हाथ पर रख दिया... वह बहुत बेचैन नज़र आ रही थी...उसकी भावनाएं भड़की हुई थीं ...उसकी निगाहों से चिंगारियां फूट रही थी...वह ख़ुद भी बेताब था, लेकिन अपने आपको किसी तरह रोके हुए था...जब उसने चंदा की नज़रों से अपनी नज़र मिलाई तो तो एक अलग अंदाज़ देखने को मिला...उसकी आंखों में याचना थी,एक आमंत्रण था...विनीत ने बिना देर किए उस आमंत्रण को स्वीकार कर लिया...अब वे दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए थे...वादों -इरादों की शहनाइयों के बीच वे दो जिस्म एक जान हो गए ...चंदा ने उसको इस अंदाज़ से अपने आपसे लपेट रखा था मानो विनीत को कोई उससे छीन लेगा...
Posted by geet gazal at 3:48 AM


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Tuesday, July 1, 2008

कहानी भाग-33
चंदा-तुम्हारी इसी सादगी पर तो मर मिटने का दिल करता है ...तुम बहुत प्यारे हो...मालिक ने तुम्हें मेरे लिए ही बनाया है... इस कोठे पर कितने लोग आए कितने गए, लेकिन कभी किसी से मोहब्बत नही हुई ...तुम सबसे अलग हो ...अब जबकि ,प्यार का ये सिलसिला शुरू हो ही गया है तो इसको ताउम्र थमने नही देना है...साथ में यह भी ध्यान रहे की हमारे बीच पनप रहे पवित्र प्यार का कभी मजाक न उड़ने पाए॥हम जैसी वेश्याओं का जीवन वैसे ही behad कष्टप्रद और काँटों भरा होता है...हमारे प्यार की दास्ताँ पर इस दुनिया में कोई यकीन नही कर सकता...तुम्हें करना होगा...अगर मुझे इस नर्क से सचमुच मुक्ति दिलाना चाहते हो तो फ़िर अपने हर वाडे को निभाना होगा...हम दोनों ही जानते है की हम जो करने जा रहे हैं वो इतना आसान नहीं है...विनीत-भले ही मुझसे वादा न कराओ ,आँखें बंद करके भरोसा कर लो ...ये विनीत अपनी जान पर खेल सकता है...आग के दरिया को चीरकर निकल सकता है ,मगर अपने प्यार के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता...चंदा-तुम सदा ऐसे ही बने रहना ...आज से तुम मेरे जीने का मकसद बन गये हो... तुम्हारे लिए मैं भी अपनी जान पर खेल जाउंगी...अपने इस पेशे को छोड़कर मैं कुछ भी कर सकती हूँ...उसकी baton में बड़ा रस था ...विनीत बड़े ध्यान से सुन रहा था...अब वह और भी जोश में आ गया...चंदा का बदन pto
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Tuesday, July 1, 2008

कहानी भाग-33
चंदा-तुम्हारी इसी सादगी पर तो मर मिटने का दिल करता है ...तुम बहुत प्यारे हो...मालिक ने तुम्हें मेरे लिए ही बनाया है... इस कोठे पर कितने लोग आए कितने गए, लेकिन कभी किसी से मोहब्बत नही हुई ...तुम सबसे अलग हो ...अब जबकि ,प्यार का ये सिलसिला शुरू हो ही गया है तो इसको ताउम्र थमने नही देना है...साथ में यह भी ध्यान रहे की हमारे बीच पनप रहे पवित्र प्यार का कभी मजाक न उड़ने पाए॥हम जैसी वेश्याओं का जीवन वैसे ही behad कष्टप्रद और काँटों भरा होता है...हमारे प्यार की दास्ताँ पर इस दुनिया में कोई यकीन नही कर सकता...तुम्हें करना होगा...अगर मुझे इस नर्क से सचमुच मुक्ति दिलाना चाहते हो तो फ़िर अपने हर वाडे को निभाना होगा...हम दोनों ही जानते है की हम जो करने जा रहे हैं वो इतना आसान नहीं है...विनीत-भले ही मुझसे वादा न कराओ ,आँखें बंद करके भरोसा कर लो ...ये विनीत अपनी जान पर खेल सकता है...आग के दरिया को चीरकर निकल सकता है ,मगर अपने प्यार के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता...चंदा-तुम सदा ऐसे ही बने रहना ...आज से तुम मेरे जीने का मकसद बन गये हो... तुम्हारे लिए मैं भी अपनी जान पर खेल जाउंगी...अपने इस पेशे को छोड़कर मैं कुछ भी कर सकती हूँ...उसकी baton में बड़ा रस था ...विनीत बड़े ध्यान से सुन रहा था...अब वह और भी जोश में आ गया...चंदा का बदन pto
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भाग-३२ दूसरा पार्ट
चंदा-इतनी दीवानगी अच्छी नहीं होती... कल को पछताना पड़ेगा , तब न कहना की बताया नहीं था...विनीत- चलो , ये भी वादा रहा..कभी कोई गिला -शिकवा नहीं करूंगा ...अगर एसा हुआ तो जो चाहो सज़ा देना...चंदा-तुम सज़ा पाने के नही, मज़ा पाने के हक़दार हो...अब इस सच्चाई को मैं ज्यादा देर तक नहीं छिपा सकती की मुझे भी बेहिसाब मोहब्बत हो गई है... प्यार के अहसास से ही मन में पटाखे से छूटने लगते हैं...विनीत खुशी से उछाल पड़ा...वह चंदा की हाँ सुनने के लिए बेताब था... किसी ने कहा भी है-प्यार ,प्यार होता है, यार,कुछ भी हो यार होता है। भूल जाता है सब छ्क्क्दी , जिसके सर पर इश्क का भूत सवार होता हैचंदा-अरे वाह इ तुम तो आशिक भी हो और मिजाज़ भी शायराना है... हमारी -तुम्हारी जोड़ी खूब जमने वाली है॥विनीत- ये बातें सुनकर मेरे मन को जो हार्दिक सुकून मिला है, मैं उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता ..चंदा की बातों ने विनीत के होंसलों को और भी ज्यादा बढ़ा दिया था...अब वह चंदा के गदराये बदन को सहला रहा था...एक बार फिर कामोत्तेजना का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ...
Posted by geet gazal at 5:22 AM 0 comments

भाग -32
इस माहौल में उन दोनों को असीम सुख की अनुभूति हो रही थी...चंदा को जीवन में पहली बार इतना आनंद आ रहा था...विनीत की तो बात ही अलग थी...वो तो अपने आपको दुनिया का सबसे खुशनसीब समझ रहा था...ग़लत रस्ते हमेशा दूर से हसीं दिखाई देते हैं...विनीत भी कुछ बिगडे हुए दोस्तों की सोहबत में आकर चंदा के कोठे तक आ गया था... चंदा भले ही वैश्या थी,जिस्म बेचकर पेट की आग बुझाना उसका पेशा था, मगर विनीत की कोमल भावनाओं ने उसके ह्रदय में हलचल मचा दी थी...विनीत की भोली -भोली बातें उसके मन में गहरे तक उतर जाया करती थी...जब उन दोनों की सांसें जोर-जोर से चलने लगीं तो चंदा ने पूछा- तुमसे मिलकर दिल खुश हो गया है...इससे पहले जीने का कोई मकसद ही नही था...तुमने मेरी रग-रग में आग सी लगा दी है..मुझे इतनी सुकून भरी बेचैनी कभी किसी ने नहीं दी...तुम तो साक्षात् कामदेव लगते हो...एक राज की बात बताऊ ? विनीत- अपने करीब बुलाकर इतना बेगाना न बनाओ... जो भी चाहती हो,दिल खोलकर कहो... मैं स्वागत ही करने वाला हूँ...
Posted by geet gazal at 4:30 AM 1 comments
Friday, June 27, 2008

Blogger Buzz: Show off your favorite blogs with a Blog List
Blogger Buzz: Show off your favorite blogs with a Blog List
Posted by geet gazal at 3:38 AM 0 comments
Thursday, June 26, 2008

कहानी 1
काश , तुम मेरी माँ को समझ पाती...वे तो जीती- जागती देवी हैं ...मेरी किसी भी बात को मेरी माँ ने आज तक नही टाला है ..मुझे हर खुशी बख्शी है... मुझे पूरा भरोषा है किVOजरूर-जरूर मान जाएँगी ...मुझे दुनिया के तानों की भी परवाह नही है...
Posted by geet gazal at 5:10 AM 3 comments

kahani
मैं तो अब भी बस इतना ही जान पाया हूँ की मुझे तुमसे प्यार है और मैं किसी भी हालत में अपने प्यार को खोना नही चाहता ...तुम समझ रही हो न, मैं क्या कह रहा हूँ...मुझे तुम्हारे पेशे से कोई कोई नफरत नही है...चंदा , तुम्हारी आत्मा पवित्र है... तुम्हारे विचार भी सुंदर है... सिर्फ़ तुम्हारे हालात् अच्छे नही थे... तुम कमसिन थी...तुम्हारे पिता शराबी थे... भगवन ने तुमरी माता को तुमसे बचपन में ही छीन लिया था...अगर वो होती तो शायद आज यहाँ पर नही होती...खैर, कोई बात नही...होता तो वही है जो तक़दीर में लिखा होता है... हाँ, अगर कोई जानबूझकर ठोकर खाता है तब बड़ी तकलीफ होती है ...अब यदि तुम मेरे प्यार को समझकर भी नादाँ बनी रही तब मैं तुम्हें कभी माफ़ नही कर पाउँगा। मैं तो क्या मालिक भी माफ़ नही कर सकता...चंदा- मेरे इतना समझाने पर भी पागल बन रहे हो? सर से इश्क का भूत उतरते ही होश ठिकाने में आ जायेंगे...विनीत, मैंने दुनिया देखी है ...सच्चाई बड़ी कड़वी होती है ...तुम अभी बहुत छोटे हो...अगर मै तुम्हारी बात मान भी लू तो कौन सी बड़ी बात हो जायेगी? क्या मेरे न होने से यह कोठा बंद हो जयेगा ? क्या फ़िर किसी चंदा को वैश्या बनाने के लिए मजबूर नही किया जाएगा ? यह दुनिया है ...किसी एक चंदा के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है ? तुम्हारी कुर्बानी बेकार चली जायेगी..तुम सुंदर लड़के हो...भी तुम्हे बहुत दूर जाना है ...मुझे भूल जाओ...विनीत-तुम्हारी हर बात मानूंगा..जान की कहोगी तो जान भी दूंगा...बस इसी बात को छोड़कर...अगर मेरे अन्दर कोई कमी है या तुम मुझे पसंद नही करते ,वो बात अलग है...साथ में यह भी अच्छी तरह जान लो की मैं कोई त्याग -व्याग नही कर रहा हूँ...अगर किसी ग़लत व्यवस्था का गला kaataa जाए तो बुरा क्या है?
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Sunday, June 15, 2008

peeke tattu
tere mast mast jovan pe mera dil bhi lattu ho gayamai peeke tattu ho gaya mai peeke tattu ho gayatere nain kateele kajraretere yauvan ke phal gadrareis gaon ke chore ib saretere ishq me ho gaye matvaretere husn ka chakhna chakh chakh ke ab mai bhi chattu ho gaya-mukesh kumar masoom ,mumbai. 9892370984
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Thursday, June 5, 2008

kamtar
is kadar halat ne kamtar bana diya. sab log thukrane lage patthar bana diya. mukesh kumar masoom, mumbai. 09892370984
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July (14)
मेरे मन को तुम तो इतना भा गए हो
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भाग ३५ ख
कहानी .भाग -३५क
कहानी .भाग 35
भाग ३४ ख
भाग ३४क
कहानी . भाग 34
गीत ...जब चाहा दिल को लूट लिया....
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भाग -३३ क
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भाग -४३

आशा काली नागिन की तरह फुंकारने लगी... काली- पीली आँखें निकालते हुए बोली-
- जरा सोच, अब तो सोच ... आखिर जी ते जी तुझे मरने की दुआ क्यों करनी पड़ रही है... ? इसकी वजह यह नाशुक्रा ही तो है... यह तेरा दोस्त नहीं, बहुत बड़ी बला है... जबसे इसने तेरी जिंदगी में प्रवेश किया है तभी से तेरी उलटी गिनती शुरू हो गई है ... ते सब बातें तेरी समझ में क्यों नहीं आ रही ?
चंदा- मैं सोच रही हूँ की अब आर या पार हो जाना चाहिए... हर तकलीफ तो मैं सह ही चुकी हूँ , और भला इससे बड़ा दुःख और क्या होगा ? वैश्या से ज्यादा गिरा हुआ काम क्या हो सकता है ? अगर विनीत मेरे साथ वफ़ा नहीं करेगा तो शरीर बेचकर बाकी का जीवन गुजार लुंगी... तुम्हारा कोठा जिंदाबाद...
आशा- अपनी आखों के सामने देखी हुई मक्खी नहीं खाई जाती... सब कुछ जानकर भी नादाँ बन्ने से क्या हासिल होगा ? ये सब बातें मैं तुझसे क्यों कह रही हूँ... तेरे को मालूम है ?
चंदा- जानती हूँ ...मेरी भलाई की खातिर ...
आशा- फिर भी तेरी अक्ल पर पत्थर पड़े हुए हैं...
चंदा- हाँ, शायद ऐसा ही कुछ है... बस एक बार मुझे ख़ुद निर्णय लेने दो...
आशा- इस जिद का मतलब समझती हो ?
चंदा- अब मेरे दिलो-दिमाग से मौत का डर निकल क चुका है...
आशा- कुछ सजाएं उम्रकैद या फांसी से भी भयानक होती हैं...
चंदा- इस वक़्त मैं जो कर कर रही हूँ वह कम भयानक है क्या ?
आशा - अगर तुझे इस काम से तौबा करनी है तो कोई बात नहीं... मई जिद नहीं करुँगी...यहाँ से तुझे कोलकाता वाले कोठे पर ट्रांसफर कर देती हूँ ,वहां तू देख-रेख पर रहना ... यदि तुझे शादी भी करनी है तो मैं इनकार नहीं करुँगी... मैं ख़ुद आगे बढ़कर तेरा सहयोग करुँगी... फ़िक्र मत कर ...
चंदा- अगर ऐसी बात है तो मुझे अब जाने से क्यों रोक रही हो...?
आशा- बहुत सही सवाल किया है...देख, अगर तू विनीत के साथ चली गयी तो धंधे में मेरी नाक कट जायेगी... जो लोग मेरे नाम तक से थरथरा जाते हैं ,वे मुझे देखकर हसेंगे ... तेरे बाद इस कोठे की और लड़कियां भी मुझसे आँख मिलाने की जुर्रत करने लगेंगी... अच्छा लगेगा तुझे ? मेरी बर्बादी से तुझे कुछ सुकून हासिल हो जाएगा ? मेरे बरसों की मेहनत पर पानी फेरकर तुझे आख़िर क्या मिलेगा ? मेरे कोठे पर बगावत से तुझे क्या मिलेगा ? यह बहुत बड़ा पाप है... अपनी मौसी के साथ तू ऐसा करना चाहेगी?
- मौसी , आपके पास सब कुछ है... जमीन भी है और आसमान भी... इसमें से अंजुली भर स्थान मुझे भेंट करदो...मुझे और कुछ नहीं चाहिए ... अगर तुम हसकर विदा नहीं करोगी तो मैं यहाँ से जा नहीं पाऊँगी... और अगर नहीं गयी तो जी नहीं पाऊँगी...
आशा- तुम इतनी जिद्दी क्यों हो ?








Thursday, July 10, 2008

भाग -४२

बदन सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था ... उसने सीधे हाथ से अपना कलेजा थाम लिया... आशा के होठो पर जहरीली मुस्कान नाच रही थी... आशा ने फ़िर तीर चलाया-

-कोई अच्छे घर का युवक किसी वैश्य से शादी करना क्यों चाहेगा ? बोलो न , ख़ुद सोचो... अब तो सिर्फ़ सोचने को कह रही हूँ,अगर ध्यान से और समझदारी से काम नहीं लिया तो जीवन भर तरसना पड़ेगा... आजकल के लफंगों को मैं बेहतर ढंग से जानती हूँ... काम -धाम तो अच्छी तरह से कर नहीं पाते...तुम जैसी काम वालियों को पटाकर मुफ्त का माल हजम कर लेते हैं... अगर वह कुछ करता -धरता नहीं तो फ़िर खायेगा क्या, तुम्हारा पेट कैसे भरेगा ?इसका जोई जवाब है तुम्हारे भेजे में ? जब कोई लड़की जिस्म फरोशी के धंधे में आ जाती है तो उसे तरह-तरह के शौक़ लग जाते हैं... वे शौक़ कैसे पूरे करोगी? अगर ये सोचती हो की मन को मार लोगी तो तुम्हारा भ्रम है... यह सब इतना आसान होता तो तुम इस लड़के का मोह क्यों नहीं छोड़ देती? तुम्ही तो कहती थी की मैं तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद हूँ... अब तुम्हारी चाहत को ये क्या हो गया है? यह सब किसकी वजह से हुआ ?तुम सच्चे प्रेम की बात करती हो न, ठीक है ... उसे कौन नहीं मानता...सच्चे प्यार को तो मैं भी नमस्कार करती हूँ... लेकिन यह कैसा प्यार है?जिस प्यार के कारन बरसों के रिश्ते नफरत में बदल जाएँ उसे तुम क्या कहोगी? प्यार में खुशियाँ बांटी जाती हैं... गम की सौगातें नहीं दी जाती ... खर छोडो, ये सब तुम क्या समझ पाओगी...
चंदा- आप जो कहती हैं वह भी सच है, मगर मैं सिर्फ़ इतना जानती हूँ की विनीत का मन शीशे की तरह साफ है...
आशा- उसके दिल की सोनोग्राफी करा चुकी हो क्या ?किसी परदेसी की बातों पर इतना भरोसा कभी नहीं करना चाहिए... इन कोठों पर ज्यादातर लड़कियां इसी तरह धोखे की शिकार होती हैं... जब उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता तो पेट की आग बुझाने के लिए वे जिस्म बेचने लगती हैं ... तुम तो पहले से ही इस दल-दल में फँसी हुई हो... तुम्हारा क्या हाल होगा, यही सोच-सोचकर मैं हलकान हुई जाती हूँ... इच्छा तो होती है की मार-मार हंटर तेरी चमड़ी उधेड़ दूँ , मगर मेरे हाथ काँपने लगते हैं, जिन हाथों से तुमको खाना खिलाया , स्नेह से तुम्हारे बालों को गूंथा ,उन्ही हाथों से तुम्हारी पिटाई कैसे करूँ ? क्या तुम्हारी संवेदनाएं इतनी शून्य हो है की मेरे प्रति किसी तरह के भाव पैदा नहीं हो रहे? क्या तुम्हारे कठोर मन में कभी दया के विचार नहीं आते ? इस उम्र में भी तुम मुझ पर ज़ुल्म कर रही हो... कैसा ज़माना आ गया है...
आशा अपने सर पर हाथ रखकर बैठ गई ... वह जान गई थी की चंदा के जिगर में विनीत की मोहब्बत ने घर कर लिया है... इश्क की ताकत का उसे अच्छी तरह इल्म था... जब उसको लगा की अब चंदा सख्ती की भाषा नहीं समझेगी, हथियार से नही सुधरेगी तो उसने प्यार के तीर चलाने शुरू कर दिए ...वह उसका असर भी देख रही थी ... चंदा किसी सोच में मगन थी... आशा उसे गौर से निहार रही थी...चंदा के सर पर हाथ फिरते हुए वह पूछने लगी-
- क्या सोच रही है मेरी बच्ची...?
चंदा- मैं उससे वादा कर चुकी हूँ...
आशा- अपने उज्वल भविष्य की खातिर यदि वादा तोडा जाता है तो वह गुनाह नहीं होता...
चंदा- अगर मैंने उसे धोखा दिया तो फ़िर कोई किसी वैश्या के प्यार पर यकीन नहीं करेगा...
आशा- अब भी कौन करता है , कोई नहीं ...यह महज़ वहम है तुम्हारा....
चंदा- मुझे एक बार आजमाकर तो देखने दो...
आशा- मौत की रिहर्सल नहीं की जाती पागल लड़की...
चंदा-अब जीने से घटन होने लगी है... अगर यूँही गुट-घुटकर मरना ही जिंदगी है तो इससे तो मौत ही बेहतर है...

Tuesday, July 8, 2008

भाग -४१

मैंने तो ये सुना है की माँ अपने बच्चों के लिए जान भी देदेती है... जब तुमने माँ की ममता का जिक्र कर ही दिया है तो मैं तुम्हें इसी ममता का वास्ता देती हूँ... मुझे माफ़ कर दो ,माँ...
जालिम आशा का पत्थर दिलभी पिघलने लगा... उसे महसू हुआ जैसे उसके अन्दर कुछ टूट - फ़ुट होने लगी है...वह इस तोड़-फोड़ की आवाज़ को स्पष्ट सुन रही थी... यह आवाज़ उसके अहम् की थी... उसके जेहन में जो नफरत का पहाड़ बड़ा हो रहा था, अब वह धीरे-धीरे टूट रहा था... आशा का नारीत्व जाग्रत हो रहा था... इंसान चाहे तो सारी दुनिया से लड़ सकता है, यहाँ तक की विजय भी प्राप्त कर सकता है,लेकिन अपने आपसे झगडा करना भी बेहद कठिन काम है... वह अब इसी दौर से तो गुजर ही रही थी... जिस कठोरता और क्रूरता को उसने बरसों सहेजकर रखा था ,वह आज अस्तोत्व्हीन होने जा रही थी...यदि कोई चीज बरसो तक एक ही स्थान पर जमी रहे तो उसे निकलने में भी तकलीफ होती है और उसको निकालना में भी...तभी तो आशा ने चंदा को माफ़ करने के बजाय उसके मन में और भी कठोरता भर दी थी... वह चंदा से कुटिलता के साथ बोली-
-तुम्हारे मुख से माँ शब्द अच्छा नही लगता... अगर तुमने मुझे अपनी माँ जैसा समझा होता तो आज मेरे बनाए क़ानून को इस तरह नहीं तोड़ती... जो सिर्फ़ जन्म देती है वोही माँ नहीं होती... पालन-पोषण कर बड़ा करने वाली भी माँ से बढ़कर होती है... मैंने भले ही तुम्हे अपनी कोख से जन्म नहीं दिया है, लेकिन इतनी बड़ी करने में मेरा जो योगदान है उसे तुम तो क्या कोई नहीं भुला सकता...मैंने अपने कोठे की सभी लड़कियों से ज्यादा प्यार तुमसे किया और तुमने उसका ये सिला दिया... आज अगर तुम्हारी माँ भी जिन्दा होती तो तुम्हारे जीवित होने पर अफ़सोस कर रही होती... एक जरा से लड़के के लिए तुमने मेरे साथ विश्वाश्घात कर दिया... ऑफ़ , तुम्हे इतना भी ज्ञान नहीं की तुम्हारी यह बगावत मुझे कितनी महगी पड़ेगी... हर ऐरी- गैरी लड़की हमको आँख दिखाने की कोशिश करेगी... क्या इज्जत रह जायेगी मेरी... एक बार मुझसे कहा होता , मैं अच्छे से अच्छा लड़का देखकर तुम्हारी शादी करा देती... अब भी यदि तू मेरे कहने को मान लेती है तो मैं तेरी शादी बड़े रईस के साथ करा सकती हूँ... मुझे वो लड़का बिल्कुल अच्छा नहीं लगा॥ फ़ोन पर ही जो इतनी बेहूदी बातें कर सकता है वह सामनेआने पर कितनी गिरी हुई बातें करेगा,इसका अनुमान मैं लगा सकती हूँ... क्या नाम है उसका ?
-आपने कुछ ग़लत सुन या समझ लिया है ... वह ऐसा नहीं हैं...
आशा- मैंने तुझसे नाम पुछा और तू उसकी वकालत करने लगी... ऐसा क्या खास है उस लड़के में ?जब तुझे यहाँ लाया गया था तो तेरा नशा ढीला करने के लिए तेरे कमरे में मैंने एक साथ चार खतरनाक लड़कों को भेजा था ... कमाल है तेरे को उनमे से कोई पसंद नहीं आया... उस लड़के की खासियत तो बता... उसका नाम तो बता...
चंदा- विनीत...
-आशा -काम क्या करता है?
चंदा- कुछ नहीं ...
आशा- अब उसे कुछ करने की जरुरत भी क्या है? तुझे मीठी- मीठी बातो में फंसा लिया है और भला क्या चाहिए ? अब तू धंधा किया करना,वह दलाली किया करेगा , तू आराम से मके उप करके इंतजार किया करना... कितना बढ़िया हो जाएगा, घर की कमाई घर में ही रह जायेगी ....
आशा न जाने किस बात पर जोर-जोर से हस रही थी.... चंदा के होठ कुछ सोचने के अंदाज़ में सिकुड़ते जा रहे थे...







\



भाग -४०

उसको रन्नो की तड़प अच्छी तरह याद थी... जब वह पांचवी मंजिल से नीचे गिरी तो ऐसे कराह रही थी जैसे की जिबह के वक़्त बकरा मिमियाता है... उसको आशा के मुस्टंडों ने ही फैंका था... जब बेचारी रन्नो को अस्पताल ले जाया गया तो उसने बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया ... ठीक उसी समय रन्नो का आशिक भी कोठे आया हुआ था... उन दोन के बीच मीलने का यही वक़्त मुक़र्रर हुआ था...रन्नो के कत्ल की ख़बर ने आशा के जेहन को बड़ा सुकून पहुचाया था... वह जोर-जोर से हस रही थी और जाम पर जाम टकरा रही थी... रानू का यार इस सबसेबेखबर था...आशा ने उसकी खिदमत में कोठे की सबसे खूबसूरत लड़की को लगाया था...उसे भी शराब पिलाई है... जब वह पूरी तरह टुन्न हो गया तो पुलिस को बुला लिया गया... हमारी पुलिस की कार्यकुशलता को तो सब जानते ही हैं... भरष्ट पुलिस वाले अगर अपनी सी पर आजायें तो झूठे
सबूत इकट्ठे करना और फिर फर्जी मुक़दमे तैरयार करने में उनका कोई सानी नहीं है... यहाँ पर भी पुलिस ने अपनी महानता का परिचय दिया... रन्नो के महबूब को ही उसका कातिल सिद्ध कर दिया गया...

वह बेचारा बेवजह जेल चला गया...चंदा उसी बारे में सोच-सोचकर परेशां हो रही थी... आशा ने चंदा के बालों को भीचकर फ़िर से सवाल किया-

-कुछ याद आया, या फ़िर बताना पड़ेगा...?

चंदा- अगर कसूर मेरा है तो सज़ा भी मुझे ही मिलनी चाहिए... तुम्हें हर किसी का वास्ता, प्लीज मेरे विनीत से कुछ मत कहना ... वह बहुत भोला आदमी है...

आशा-वाह री मुनिया...हमारी ही बिल्ली और हमसे ही म्याऊं ... वो कल का छोकरा अब तेरा अपना हो गया और मैंने माँ बनकर तेरा पालन- पोषण किया, उसका कुछ नहीं... आज तू अपनी मौसी का अपमान कर रही है ...तेरा वो अच्छा इंसान तुझे ऐसी ही अच्छी ट्रेनिंग दे रहा है... ?

तड़पकर रह गई चंदा...आशा ने जो व्यंग्य बाण चलाया था, वह सही जगह पर काम कर गया... अपने हाथों को मलते हुए चंदा बोली-

- ऐसा क्यों कहती हो मौसी,तू तो मेरी सब कुछ हो...अगर तुम न होती तो मेरा क्या होता ?मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊँगी... अगर चहुँ तो भी नहीं... विनीत से एक बार बात तो करके देखो... वह तुम्हें जरुर पसंद आ जाएगा... उसके विचार बहुत उच्च और पवित्र हैं... उसका दिल बड़ा साफ है॥ मेरे कहने से उससे सिर्फ़ एक बार मिलकर तो देखो...

क्या तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकती?अगर आज मेरी माँ जिन्दा होती और मैं उससे ये बात कहती तो क्या वह भी मेरी बात नहीं मानती... क्या बेटी की खुशियों के लिए एक माँ इतना भी नहीं कर सकती, अगर वो माँ है तो ?

Sunday, July 6, 2008

भाग -३९

रन्नो भोली थी... नादाँ थी... वह आशा की बातों में आ गई... उसने आशा के ग्राहक के साथ एक रात बिताने की बात स्वीकार कर ली...रन्नो के सीधेपन का फायदा भी उसने जमकर उठाया... उसने रन्नो को संसार की सबसे खतरनाक सज़ा दी... आपको मालूम है की दुनिया की सबसे खतरनाक सज़ा akhir किसको कहते है...? यदि आप ऐसी कुछ सजाओं को जानते होंगे तो भी आशा द्वारा धाये गए जुल्मों को सुनकर निश्चित रूप से आपकी आत्मा थर्रा जायेगी...पता है, आशा ने क्या किया? उसने एक ऐड्स पीड़ित व्यक्ति को बुलवाया,रन्नो को उसके साथ सोने के लिए पहले ही तैयार किया जा चुका था... रन्नो ने भी सोचा होगा की जिस महिला के इशारों पर नाचते हुए तमाम जिन्दगी गुजर गई , उसके कहने पर एक रात और सही... उसको क्या मालूम था की वह अपने ही हाथों अपने गले में फंसी लगाने जा रही है... उसको तो जब पता चला जब रात गुजर गई...उसने पूरी रात आशा के खास ग्राहक के साथ बिताई..जब तक सुबह हुई , तब तक , रन्नो के जीवन में हमेशा के लिए अँधियारा छ चुका था... कोठे की हर लड़की ने ये nazara देखा था जब सुबह आशा ने रन्नो को एक सुंदर और कीमती साडी देकर विदा किया था... साथ में यह भी कहा था -
- जा रन्नो , तू भी क्या याद करेगी... ये तेरे लिए सफ़ेद साडी क्यों लाई हूँ जानती हो....तुम क्या जानोगी... अगर इतना ही जानती तो यह लफडा क्यों करती ...प्यार-व्यार के घटिया चक्कर में क्यों पड़ती ?
भोली रन्नो ने एक बार फ़िर याचना की थी-
- मैं समझी नहीं मौसी....
सब लोग कोठा मालकिन आशा को मौसी के संबोधन से ही पुकारते थे... रन्नो के भोले सवाल पर आशा सिर्फ़ मुस्कराई नहीं बल्कि खूब जोर से हसी... फ़िर ज़हर उगलते हुए बोली-
- अरे पगली, सफ़ेद लिबास विधवाओं को पहनाया जाता है... और बताऊँ , तूने जीवन बीमा वालों का वो विज्ञापन नहीं पढ़ा क्या ,जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी... बस यूँ समझ लो की यह लिबास भी तुम्हारे काम इसी तरह आने वाला है... तुम्हारे साथ रात भर जिस शख्श ने जिस्मानी तल्ल्कुलात बनाए , जानती हो वह कौन था,नहीं समझी? अब भी नहीं... अरे वो ऐड्स का मरीज था... वह मरने वाला है ... समझो ना ,आखिरी स्टेज पर चल रहा था... मैंने उसे खास तौर पर पाल रखा है... तुम जैसी कामिनी और कमज़र्फ़ औरत के लिए...तुम लोग उन में से हो , जो जिस हंडी में खाते हैं ,उसी में छेड़ करते हैं... जिस छत के साए में जीते हो, उसीकी बुनियाद को खोदते हो...मैंने ऐड्स पीड़ित व्यक्ति को तुम्हारे पास इसीलिए भेजा,ताकि वह तुम्हारे साथ बिना कंडोम के शारीरिक सम्बन्ध बनाए और तुम भी ऐड्स की रोगी बन जाओ... फ़िर तुम्हारा आशिक भी तुम्हारे साथ सम्बन्ध बनाएगा और तुम दोनों ही तड़प-तड़पकर मर जाओगे.... या फ़िर ये होगा की तुम उस कमीने से ख़ुद ही अपना दमनछुडा लोगी....कुल मिलकर इस कोठे पर वाही होगा जो मैं चाहूंगी..समझ गई रानी रन्नो... मेरे दिल को दुखाकर बहुत खुश होती फिरती थी... अब मैं खुश होउंगी और तुम दोनों रोते फिरोगे... अब इतना भी बताने की जरुरत नहीं है की ऐड्स का किसी भी मुल्क में मुकम्मल इलाज नहीं है...ये भी सत्य है की अगर एक ऐड्स पीड़ित व्यक्ति बिना कंडोम के किसी महिला के साथ सम्बन्ध बनाता है तो उसको भी ऐड्स होना लाजिमी है... मैंने कुछ ग़लत कह दिया क्या?तुमने रात कंडोम लगाया था?कैसे लगतीं...यार के सपनों में जो खोई हुई थी... जो लड़की मुझे चुनौती देती है... मैं उसका यही हाल करती हूँ ... अगर फ़िर किसी ने मुझसे बगावत करने की बात बी ही सोची, तो मैं उसका भी यही हाल करुँगी... चंदा के ख्यालों में ज्यों -ज्यों ये बातें आ रही थीं, वह त्यों-त्यों कांपती जा रही थी... उसका शरीर जूडी के मरीज़ की तरह हिल रहा था... चंदा को इतना भय ख़ुद के लिए नहीं लग रहा था,जितना की विनीत के लिए था... उसे रन्नो और उसके आशिक के हाल का भी अच्छी तरह ज्ञान था...


भाग -38

जानते हो इंसान को सबसे ज्यादा दुःख कब होता है? जब उसके भरोसे का कत्ल होता है ... आशा के साथ यही तो हुआ था... वह चंदा पर सबसे अधिक विश्वाश करती थी... उसने भरी रकम खर्च कर उसे ख़रीदा था... सबसे ज्यादा कमाई भी उसे आशा ने ही करके दी थी ... नेताओं की तो वह खास पसंद बन चुकी थी... उसे चंदा पर इतना भरोसा था की वह ग्राहक के साथ १०-२० दिनों के लिए भी आँख बंद करके भेज दिया करती थी... उसे बहुत से लोगों ने रिझाने की कोशिश की मगर चंदा ने कभी किसी को घास नहीं डाली थी... उसे बस पैसे से मतलब था... तय रकम से अलग बख्शीश निकलने में उसे महारत हासिल थी... आशा जिस पर अँधा विश्वाश किया, वाही उसे धोखे में रखकर अपने आशिक के साथ फुर्र होने की फिराक में थी... चंदा उसकीमार खाकर रोई नहीं , बस तिलमिला गई... फ़िर अगले ही पल उसके जेहन में सारीकहानी घूम गई... उसने पहले भी आशा को कई लड़कियों के फ़ोन चोरी-चिपके सुनते हुए देखा था... अब वह सब कुछ जान गई तो फौरन बोली-
- मैं आपसे सब कुछ बताने ही वाली थी... दरअसल ,मैंने फ़ैसला किया ....
वह अपना वाक्य अभी पूरा भी नहीं कर पाई थी की आशा का जोरदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा... उसका गाल झनझना गया... अपने दांत पीसते हुए वह बोली-
- हरामजादी, तू कौन होती है अपने फैसले करनेवाली...तू मेरी ज़रखरीद गुलाम है... तेरी हर साँस पर मेरा अधिकार है... तेरी सोच पर भी मेरा हक है... तुझे तो किसी को याद करने का भी हक नहीं है... शायद तू यह नहीं जानती की तेरी जिन्दगी पर भी मेरा हक है और मौत पर भी... और कुछ जानना चाहती है तू? आज से तेरे साथ वाही सलूक किया जायेगा जो चार साल पहले रन्नो के साथ किया था...
उसकी धमकी सुनकर चंदा के पैरों से ज़मीं खिसक गई... रन्नो ने भी तो बी अस वाही गुनाह किया था, जो फिलहाल वह कर बैठी है... प्यार... कितना छोटा सा शब्द है, मगर अपने अस्तित्व में कितना अर्थ समेटे हुए है... इसी प्यार ने उसे दुनिया को देखने की एक नई द्रष्टि दी थी... साथ ही उसके जीवन को अजीब उलझन में भी दाल दिया था...रन्नो की बात उसे फिर याद आने लगीं...वह बड़ी मासूम सी लगने वाली गुडिया थी... दिल की बेहद सीधी और हर आदमी की मदद करने वाली... उसने कई बार ख़ुद चंदा की भी काफी मदद की थी... जब आशा को पता चला कीसी से रन्नो को महब्बत हो गई है और सोना का अंडा देने वाली मुर्गी उसके चंगुल से निकलने वाली है तो आशा ने एक ऐसा खतरनाक खेल खेला की सुनने वालों के भी होश फाख्ता हो गए ... लोगों ने यही कहा की भगवन इतना बुरा किसी के साथ न हो... आशा ने रन्नो को पहले समझाया- बुझाया , डराया-धमकाया, और जब भी वह नहीं मानी तो उसकी पिटाई की गई... लेकिन, उस पर टी इश्क का भूत सवार हो गया था... वह नहीं मानी... फ़िर आशा चुडैल बन बैठी... उसने रानू से कहा-
- अगर तू जाना चाहती है तो जा , मगर मेरी एक बात सुनले ...

रन्नो -कहिये...मैं हर बात ये बात छोड़कर हर बात मान लुंगी...
आशा-मेरा एक खास ग्राहक है, वह तुझ पर जान छिडकता है...आज आया हुआ है... बहार गया था, आज ही वापस आया है... तेरे लिए हजारों खर्च करने को तैयार है... मेरे कहने से उसे एक बार संतुष्ट करदो... वो पैसे भी तुम्ही लेलेना ... मुझे पैसे का लालच नहीं है...
बेचारी रन्नो को क्यापता था की उसके साथ क्या होने वाला है... वह आशा की मानने को हमेशा तैयार रहती थी... चलते समय उसने आशा का दिल दुखाना उचित नहीं समझा ...










कुछ

Friday, July 4, 2008

भाग ३६क

-अब यहीं पर बैठने भर से काम नहीं चलेगा... मैं यहाँ की सैटिंग करती हूँ ,तुम यह जुगाड़ भिडाओ की यहाँ से भागकर आखिरकार हम जायेंगे कहाँ ? तुम अपने परिवार वालों से भी बात करो ,अगर वे मान जाते हैं तो सबसे अच्छी बात है और अगर नहीं मानतें तो फ़िर क्या करना है ,इसका भी तो ख्याल रखना है..
विनीत-तुम उसकी फ़िक्र मत करो,वो सब मैं अच्छी तरह से कर लूँगा...
चंदा- तो फ़िर ठीक है... आशा और उसके दलालों से निबटने का रास्ता मैं निकलती हूँ... मैं ऐसी संभावनाएं तलाशती हूँ जिससे हमें यहाँ से मुक्ति पाने में आसानी हो... इतना ध्यान रहे की हम सांप के बिल में हाथ दाल रहे हैं... जरा सी गलती भी हमको बहुत नुक्सान पंहुचा सकती...

कहानी . भाग-36

चंदा-अब तक तो मैं प्यार का मजाक ही उडाती रही...तुमने मेरी जिन्दगी में आकर मुझे प्रेम का सच्चा एहसास कराया है...अब मुझे जीने में बड़ा आनंद आने लगा है...अब आकर मुझे प्रेम की सच्ची ताक़त का पता चला है...अब भले ही आशा रूंठे या फ़िर साडी दुनिया,मुझे कोई गम नहीं है...अपने जीवन की डोर तुम्हारी डोर से बाँध दी है...अब जान देकर भी इस प्यार की रक्षा की जायेगी...वैसे दुखों की लहरों से लड़ते-लड़ते मुझे स्थायित्व का किनारा मिल गया है,मगर तुम्हारे पवित्र प्रेम की खातिर मैं ये सब छोड़ दूंगी...
विनीत-शुक्रिया चंदा...मेरे प्यार पर ,मेरी बातों पर भरोसा करके तुमने बहुत बड़ा एहसान किया है...अगर कोई रिवाज बिना रोक -टोक किए बरसों चलता रहे तो वहीदस्तूर बन जाता है...तुहारे इस कदम से आने वाले लोग सबक लेंगे...जिन महिलाओं को दलालों ने जबरन वैश्यावृत्ति के दल-दल में फंसा रखा है...अब वे भी अपने हक के लिए आवाज़ उठा सकेंगी...अब जिस वैश्या को भी किसी ग्राहक से सच्चा प्रेम होगा वह अपनी कोठा मालकिन से डरेगी नही,बल्कि अपने प्रेमी को पाने का प्रयास करेगी...तुम्हारी इस हिम्मत से बहुतों को प्रेरणा मिलेगी...
चंदा-हाँ-हाँ ,मगर ये सब तब हो पायेगा जब हमारा प्यार सफल हो जाएगा...
विनीत- अब जबकि तुम मेरे साथ हो , ऐसी स्थिति में मुझे पूरा विश्वाश है की विजय हमारी ही होगी...
चंदा-मालिक सबकी भलाई करता है फ़िर हमारा अहित ही वो क्यों चाहेगा?
वे दोनों बेहद खुश थे ... उनके मन में लड्डू फूट रहे थे ... चंदा के शरीर में तो मानो पंख उग आए थे ... वह बेहद रोमांच का अनुभव कर रही थी...चंदा ने शोखी के साथ कहा-